Monday, 2 January 2017
संबोधन-1.
मित्र, इस जीवन में कहां भटक रहे हो...क्या तुम दूसरों को आदर्श बनाकर उनका अनुकरण करोगे...वो दूसरे जो स्वयं ही भटके हुए हैं...क्या तुम दूसरों का बचा भोजन करके अपना पेट भरोगे...क्या तुम दूसरों की देखादेखी अपने ध्येय को निश्चित करोगेे...किस सोच में हो जरूर ही इस बात को सोच रहे होगे कि अगर इस जीवन में रहना है तो ऐसा तो करना ही होगा...क्या करना होगा? अनुकरण, किसी का अनुकरण पर किसका?
तुम सफल लोगों को देखते हो उनके जैसा बनना चाहते हो...उनके जैसा जीवन जीना चाहते हो पर क्या तुम जानते हो कि सफल होने का अर्थ क्या है? तुमको इस बात का चिंतन होगा कि ये कैसा प्रश्न है?
मित्र स्वयं को भुलाकर तुम कैसे स्वयं का ही विकास करोगे? तुम दूसरों की छाप लगाकर उनके ही रंग में रंगकर अपने नैसर्गिक रंग को मिटा दोगे। तुम लाख टके के हो पर स्वयं को नहीं जानते, दूसरे की दो कौड़ी की छाप लगाकर तुम स्वयं को धन्य समझ रहे हो। अरे ये तो कितनी हंसी की बात हो गई।
अब तुम परेशान होगे कि अरे महापुरुषों का अनुकरण न किया जाये तो कैसा होगा? महापुरुषों का अनुकरण कैसे किया जा सकता है वो तो मार्ग दिखाकर चले गये और कहकर गये कि हमने तुम को दिखा दिया अब तो तुमको ही आगे जाना है। ईश्वर ने हमें यहीं तक का कर्म मार्ग दिया था सो अब हम चलते हैं हां हम जो दीप ज्योति लेकर आये थे उसमें तुम अपनी ऊर्जा का तेल डालकर आगे जा सकते हो...
अब आप निश्चित करो आपको क्या करना है? आपके ही साथ मार्ग की खोज में लगा आपका मित्र.
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